लखनऊ, मंजिल उन्हीं को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है। पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है। यह पंक्तियां सिधौली निवासी डॉ. तुषार त्रिपाठी के जीवन पर पूरी तरह सटीक बैठती हैं। बचपन से लेकर युवावस्था तक एक के बाद एक कठिन परिस्थितियों का सामना करने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और रूस से एमबीबीएस की डिग्री हासिल कर अपने दिवंगत पिता का सपना साकार कर दिया। उनकी सफलता आज पूरे क्षेत्र के युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई है। सीतापुर जनपद के सिधौली निवासी शिक्षक रवि प्रताप त्रिपाठी के इकलौते पुत्र तुषार त्रिपाठी का जीवन शुरू से ही संघर्षों से भरा रहा। महज डेढ़ वर्ष की आयु में उनकी माता सुषमा त्रिपाठी का निधन हो गया। मां के निधन के बाद पिता ने अकेले ही बेटे की परवरिश की जिम्मेदारी निभाई। तुषार का बचपन काफी समय तक निगोहां क्षेत्र में अपने मामा सुनील त्रिवेदी के संरक्षण में बीता, जहां उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण की। बाद में पिता उन्हें अपने साथ सिधौली ले गए और बेहतर शिक्षा दिलाने के लिए हर संभव प्रयास किया।रवि प्रताप त्रिपाठी का सपना था कि उनका बेटा डॉक्टर बने और समाज की सेवा करे। सीमित संसाधनों और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने बेटे की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी। तुषार भी पिता के सपनों को अपना लक्ष्य मानकर पूरी लगन और मेहनत से पढ़ाई में जुट गए। मेडिकल शिक्षा के लिए उनका चयन रूस के एक मेडिकल विश्वविद्यालय में हुआ। आर्थिक चुनौतियों के बावजूद पिता ने बेटे को विदेश भेजा और हर कदम पर उसका मनोबल बढ़ाते रहे।
संघर्षों के बीच तुषार की जिंदगी में सबसे बड़ा झटका उस समय लगा, जब वह रूस में एमबीबीएस की अंतिम परीक्षा की तैयारी कर रहे थे। इसी दौरान सिधौली में उनके पिता रवि प्रताप त्रिपाठी की सड़क दुर्घटना में दर्दनाक मौत हो गई। यह खबर उनके लिए किसी वज्रपात से कम नहीं थी। एक तरफ पिता का अंतिम संस्कार था तो दूसरी तरफ वर्षों की मेहनत और भविष्य तय करने वाली अंतिम परीक्षा।इस कठिन परिस्थिति में तुषार के सामने भावनात्मक और नैतिक दोनों तरह की बड़ी चुनौती थी। उन्होंने भारी मन से फैसला किया कि वह परीक्षा देंगे, क्योंकि यही उनके पिता की अंतिम इच्छा और जीवन का सबसे बड़ा सपना था। तुषार का कहना है कि यदि वह परीक्षा छोड़ देते तो पिता का सपना अधूरा रह जाता। उन्होंने पूरी हिम्मत के साथ परीक्षा दी और उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए रूस से एमबीबीएस की डिग्री प्राप्त की।
डिग्री हासिल करने के बाद जब तुषार स्वदेश लौटे तो सबसे पहले उन्होंने अपने दिवंगत पिता को श्रद्धांजलि अर्पित की। उनके इस संघर्ष और सफलता की कहानी सुनकर सिधौली, निगोहां और आसपास के क्षेत्रों में खुशी और गर्व का माहौल है। परिजन, शिक्षक, मित्र और क्षेत्रवासी उन्हें लगातार बधाई दे रहे हैं।स्थानीय लोगों का कहना है कि डॉ. तुषार त्रिपाठी ने यह साबित कर दिया है कि कठिन परिस्थितियां इंसान की राह जरूर कठिन बना सकती हैं, लेकिन मजबूत इरादों और अथक मेहनत के सामने कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती। उन्होंने अपने जीवन से यह संदेश दिया है कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और हौसले बुलंद हों तो विपरीत परिस्थितियां भी सफलता का रास्ता नहीं रोक सकतीं।आज डॉ. तुषार त्रिपाठी की कहानी केवल एक युवक की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि संघर्ष, समर्पण, पारिवारिक संस्कार और अटूट संकल्प का ऐसा उदाहरण है, जो समाज के हर युवा को अपने सपनों के लिए निरंतर प्रयास करते रहने की प्रेरणा देता है।
