विशेष लेख | व्यक्तित्व विकास
लेखक: अष्टानंद पाठक
(लेखक IRAS अधिकारी,लेखक और मोटीवेशनल स्पीकर हैं.)
आज की सबसे बड़ी समस्या: स्वयं की पहचान
आज के दौर में सबसे बड़ी समस्या अवसरों की कमी नहीं, बल्कि स्वयं को पहचानने की है। अधिकांश लोग जीवन भर किसी दूसरे जैसा बनने का प्रयास करते रहते हैं, जबकि प्रकृति ने उन्हें एक अलग उद्देश्य और विशिष्ट क्षमता के साथ बनाया होता है।
हर व्यक्ति अद्वितीय है
मनोविज्ञान में ‘व्यक्तिगत भिन्नता’ (Individual Difference) का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है। इसका अर्थ है कि इस संसार में कोई भी दो व्यक्ति पूरी तरह समान नहीं हैं। प्रत्येक व्यक्ति की प्रतिभा, सोच, संवेदनशीलता, रुचियाँ और जीवन का उद्देश्य अलग-अलग होता है।
इसी कारण कोई व्यक्ति दूसरे की ‘कॉपी’ नहीं हो सकता। हर इंसान अपने आप में विशिष्ट और अनोखा है।
नकल की राह, संतोष से दूर
समस्या तब शुरू होती है जब व्यक्ति अपनी मौलिकता को भूलकर दूसरों की सफलता से प्रभावित होकर उनकी नकल करने लगता है। समाज, परिवार और मित्र भी कई बार उसे ऐसी दिशा में ले जाते हैं, जो उसके स्वभाव और क्षमता के अनुरूप नहीं होती।
परिणामस्वरूप उसे उपलब्धियाँ तो मिल जाती हैं, लेकिन आत्मसंतोष कहीं खो जाता है।
लोग असंतुष्ट क्यों रहते हैं?
अनेक वैश्विक सर्वेक्षण बताते हैं कि बड़ी संख्या में लोग अपने काम से संतुष्ट नहीं हैं। वे प्रतिदिन कार्य तो करते हैं, लेकिन उसमें आनंद का अनुभव नहीं कर पाते।
यह असंतोष धीरे-धीरे तनाव, अवसाद और मानसिक थकान में बदल जाता है। इसका प्रमुख कारण यह है कि वे ऐसे कार्यों में लगे होते हैं, जिनके लिए उनका स्वभाव और प्रतिभा उपयुक्त नहीं होती।
यदि महान लोगों ने अपनी राह छोड़ दी होती…
यदि उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ शहनाई छोड़ देते, यदि सचिन तेंदुलकर क्रिकेट छोड़ देते, यदि अमिताभ बच्चन इंजीनियर बन जाते या यदि लता मंगेशकर राजनीति में चली जातीं, तो दुनिया अनेक महान प्रतिभाओं से वंचित रह जाती।
गीता का संदेश
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है –
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावह:
अर्थात अपने स्वभाव के अनुरूप किया गया कार्य, भले ही उसमें कुछ कमियाँ हों, फिर भी दूसरे के उत्कृष्ट कार्य से श्रेष्ठ है। क्योंकि वही कार्य व्यक्ति को भीतर से संतोष देता है।
कब्रिस्तान में दफन सबसे बड़ा खजाना
कहा जाता है कि दुनिया का सबसे बड़ा खजाना श्मशान और कब्रिस्तान में है। वहाँ असंख्य ऐसे लोग दफन हैं, जिन्होंने अपनी प्रतिभा को कभी पहचाना ही नहीं। वे संसार से विदा तो हो गए, लेकिन अपनी वास्तविक क्षमता को जीने का अवसर नहीं पा सके।
अपनी ‘पिच’ खोजिए
क्रिकेट में सचिन तेंदुलकर इसलिए महान बने क्योंकि उन्हें उनकी पिच मिली। मछली इसलिए अद्भुत है क्योंकि पानी उसका स्वाभाविक क्षेत्र है।
यदि मछली को पेड़ पर चढ़ने की प्रतियोगिता में उतार दिया जाए, तो वह जीवन भर स्वयं को अयोग्य समझती रहेगी। लेकिन जैसे ही उसे पानी में उतारा जाएगा, उसकी वास्तविक क्षमता सामने आ जाएगी।
खुद की तलाश कभी मत छोड़िए
जीवन की सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक जिम्मेदारियाँ कई बार हमें ऐसे कार्य करने के लिए विवश कर देती हैं, जो हमारे स्वभाव के अनुरूप नहीं होते।
फिर भी अपनी वास्तविक पहचान और प्रतिभा की खोज कभी नहीं छोड़नी चाहिए। चुनौतियों के बीच भी आत्ममंथन जारी रखें। जिस दिन आप अपने भीतर छिपे हुए व्यक्तित्व को पहचान लेंगे, उसी दिन दुनिया भी आपके वास्तविक स्वरूप को पहचान लेगी।
निष्कर्ष
हर व्यक्ति अपनी जीवन-यात्रा का नायक है, लेकिन नायक वही कहलाता है जो अपनी वास्तविक भूमिका निभाता है, किसी और की नहीं।
इसलिए स्वयं को जानिए, अपनी प्रतिभा को पहचानिए और अपने स्वभाव के अनुरूप जीवन जीने का साहस कीजिए। दुनिया को आपकी नकल नहीं, आपकी मौलिकता चाहिए।
