
निगोहां। लखनऊ , निगोहां के उतरावां गाँव में चल रही श्रीरामकथा के तीसरे दिन सोमवार को कथा व्यास आचार्य ज्ञानेश त्रिपाठी ने भक्तजनों को अनेक भावपूर्ण प्रसंग सुनाकर भक्ति का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि मनुष्य का कर्म प्रारब्ध बनकर उसके साथ चलता है। लेकिन जब जन्म-जन्मांतर के पुण्य उदय हों और प्रभु की विशेष कृपा मिले, तभी कोई संत बनता है। जो स्वयं भगवान से जुड़ा है वही दूसरों को भी प्रभु से जोड़ देता है।कथा व्यास ने नारद मोह प्रसंग सुनाते हुए बताया कि प्रभु अपने भक्त से स्वयं पूछते हैं क्या चाहिए, माया या भक्ति?”जब भक्त अंतर पूछता है तो प्रभु कहते हैं यदि तुम्हें स्वयं नाचना है तो माया ले जाओ और यदि मुझे नचाना है तो भक्ति ले जाओ। जीव जिसके वश में होता है उसका नाम माया है और भगवान जिसके वश में रहते हैं उसका नाम भक्ति है।उन्होंने कहा कि नारद जी जब सुंदर बनने की इच्छा लेकर प्रभु के पास पहुँचे तो भगवान ने उन्हें बंदर का रूप दे दिया। क्योंकि यही उनके कल्याण का कारण था। प्रभु ने उनके अभिमान को तोड़कर भक्ति का सच्चा मार्ग दिखाया।आचार्य त्रिपाठी ने कहा कि भगवान के नाम की महिमा और उनकी शरणागति ही जीवन का वास्तविक आनंद है। जब मनुष्य अहंकार त्यागकर प्रभु के चरणों में समर्पित होता है तभी उसका जीवन सार्थक होता है।श्रीरामकथा के तृतीय दिवस पर निगोहां क्षेत्र के सैकड़ों श्रद्धालु उपस्थित रहे। पूरा पंडाल “जय श्रीराम” के गगनभेदी जयकारों से गूंज उठा और श्रद्धालु भक्ति रस में डूबे नजर आए।
कथा के संचालन व व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी निगोहां प्रेस क्लब अध्यक्ष विमल सिंह चौहान ने संभाली। उन्होंने पूरे सेवा भाव से श्रद्धालुओं की सुविधा और आयोजन की व्यवस्था सुनिश्चित की।