मोहनलालगंज। लखनऊ ,छठे दिवस मोहनलालगंज के धर्मावत खेड़ा गांव में चल रही श्रीमद् भागवत कथा में कथाव्यास महराज श्री दिनेशानंद मृदुल भागवताचार्य जी (श्रीधाम वृंदावन) ने भगवान श्रीकृष्ण और माता रुक्मिणी विवाह प्रसंग का दिव्य वर्णन किया। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण द्वारा रुक्मिणी विवाह मात्र संयोग नहीं बल्कि ईश्वर की अलौकिक लीला है।
उन्होंने बताया कि जब विदर्भ राज्य में रुक्मी ने अभिमान, अहंकार और धन रूपी लक्ष्मी का अनादर किया, तब प्रभु श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी का वरण कर यह संदेश दिया कि लक्ष्मी कभी भी अहंकार में रहने वालों के पास नहीं रहती। ईश्वर सदैव भक्तों और जनकल्याण के लिए गर्व, घमंड और अधर्म का अंत करते हैं।महराज श्री ने श्रीकृष्ण के अन्य विवाहों का उल्लेख करते हुए कहा— “जहाँ-जहाँ राजाओं ने लक्ष्मी का अपमान किया, वहाँ-वहाँ स्वयं भगवान पहुंचे और माता लक्ष्मी का वरण किया। इस प्रकार सोलह हजार एक सौ आठ दिव्य विवाह हुए।”उन्होंने आगे कहा कि यह विवाह भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, त्याग, तपस्या और बलिदान का दिव्य संदेश है। भगवान सदैव रुक्मी, शिशुपाल और भौमासुर जैसे दैत्यों से लक्ष्मी रूपी रुक्मिणी की रक्षा करते हैं।कथा के दौरान भक्त भावविभोर हो उठे और कथा पंडाल जय श्री कृष्ण के जयघोष से गुंजायमान हो गया। भावपूर्ण वातावरण के बीच छठे दिवस की कथा का दिव्य समापन हुआ।
