निगोहां। लखनऊ।कुछ माह पूर्व तक ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायत चुनाव को लेकर गहमागहमी चरम पर थी। जिला पंचायत सदस्य से लेकर ग्राम प्रधान और क्षेत्र पंचायत सदस्य पद के दावेदार गांव-गांव जनसंपर्क में जुटे थे। दीवारों पर पोस्टर, चौराहों पर होर्डिंग और सोशल मीडिया पर प्रचार की भरमार थी। लेकिन अब वही जोश धीरे-धीरे ठंडा पड़ता नजर आ रहा है।जनवरी 2026 में आए आधिकारिक बयानों के अनुसार पंचायत चुनाव अपने निर्धारित समय पर कराने की बात कही गई थी। स्पष्ट किया गया कि जनगणना का कार्यक्रम केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में है, जबकि पंचायत चुनाव राज्य सरकार के अधीन आते हैं और फिलहाल इन्हें स्थगित करने की कोई योजना नहीं है। इसके बावजूद जातीय जनगणना और ओबीसी आरक्षण को लेकर चल रही चर्चाओं ने संभावित उम्मीदवारों को असमंजस में डाल दिया है।सूत्रों के मुताबिक, पंचायती राज विभाग ने ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूला के तहत राजनीतिक पिछड़ेपन का आकलन कराने के लिए आयोग गठित करने की सिफारिश की है। यह आयोग जाति आधारित आरक्षण का रोस्टर तैयार करेगा, जिसके आधार पर सीटों का निर्धारण होगा। हालांकि अभी तक अंतिम रूप से आरक्षण सूची जारी नहीं हुई है, जिससे दावेदारों की रणनीति अधर में लटकी हुई है।ग्रामीण क्षेत्र निगोहां में पंचायत चुनाव हमेशा स्थानीय राजनीति का केंद्र रहे हैं। यहां ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य और जिला पंचायत सदस्य पद के लिए उम्मीदवार चुनाव से काफी पहले सक्रिय हो जाते हैं। गांवों में चौपाल से लेकर छोटे-बड़े आयोजनों तक में संभावित प्रत्याशी अपनी मौजूदगी दर्ज कराते रहे हैं।लेकिन हाल के दिनों में चुनाव टलने की अफवाहों और आरक्षण की अनिश्चितता ने माहौल को ठंडा कर दिया है। कई संभावित उम्मीदवार अब खुलकर खर्च और प्रचार से बच रहे हैं। कुछ ने तो अपने पोस्टर और बैनर तक हटवा दिए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जब तक सीटों की स्थिति स्पष्ट नहीं होगी, तब तक चुनावी माहौल पूरी तरह गर्म नहीं होगा।हालांकि राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनाव अगले कुछ महीनों में होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि जातीय जनगणना फरवरी 2027 से प्रस्तावित है और यह केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है। ऐसे में पंचायत चुनाव को उससे जोड़कर देखना पूरी तरह उचित नहीं है।फिलहाल निगोहां क्षेत्र में संभावित प्रत्याशी इंतजार की मुद्रा में हैं। गांव की चौपालों पर चर्चा जरूर जारी है, लेकिन पहले जैसा उत्साह दिखाई नहीं दे रहा। अब सभी की निगाहें राज्य सरकार के अगले फैसले और आरक्षण सूची पर टिकी हैं
