20 दिन की जंग के बाद किसान का हाथ हुआ ठीक
हादसे ने छीनी सात साल की आस्था, पिता का हाथ कुचला
सिगमा अस्पताल के डॉक्टरों ने चार जटिल सर्जरी कर बचाई ‘उम्मीद’
मोहनलालगंज ।संवाददाता
नियति का क्रूर क्रंदन कैसा होता है, इसकी बानगी रायबरेली के किसान अजय कुमार (35) की आँखों में साफ़ देखी जा सकती है। एक तरफ सीने में अपनी सात साल की मासूम लाडो ‘आस्था’ को खोने का कभी न भरने वाला गहरा ज़ख्म है, तो दूसरी तरफ अपने परिवार को पालने के लिए ‘हाथ’ बच जाने का एक खामोश सुकूँ। आँखों से बहते आंसुओं के बीच अजय बस इतना ही कह पाते हैं, “बेटी तो चली गई साहब, पर भगवान ने मेरा हाथ बचा लिया ताकि बाकी बच्चों का पेट पाल सकूँ।
पल भर में उजड़ गईं खुशियाँ, काल बनकर आया था ट्रक
रायबरेली के शिवगढ़ (केसरखेड़ा) निवासी अजय कुमार बीते 18 मई को अपनी नन्ही बेटी आस्था को स्कूल से लेकर घर लौट रहे थे। पिता-पुत्री हँसते-खेलते घर की ओर बढ़ ही रहे थे कि एक तेज़ रफ़्तार काल (ट्रक) ने उनकी बाइक को रौंद दिया। हादसा इतना भयावह था कि मासूम आस्था ने मौके पर ही दम तोड़ दिया। वहीं अजय का दाहिना हाथ ट्रक के पहियों के नीचे आकर पूरी तरह कबाड़ में तब्दील हो गया।
15 लाख का खर्च और हाथ काटने की नौबत
मासूम की मौत से टूट चुके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। अजय को लेकर परिजन पीजीआई ट्रॉमा सेंटर भागे, जहाँ डॉक्टरों ने कह दिया कि हाथ काटना पड़ सकता है। उम्मीद की तलाश में एक बड़े निजी अस्पताल गए, तो वहाँ 15 लाख रुपये का खर्च बताया गया और हाथ बचने की गारंटी भी नहीं थी। एक गरीब किसान के लिए यह किसी दोहरी मौत जैसा था।
सिगमा अस्पताल में डॉक्टर ने किया ‘चमत्कार’
निराशा के घने अंधेरे के बीच परिजन अजय को मोहनलालगंज स्थित सिगमा अस्पताल एंड ट्रॉमा सेंटर लेकर आए। यहाँ डॉक्टरों ने अजय के हौसले को टूटने नहीं दिया। अस्पताल के संचालक डॉ. सिद्धार्थ पटेल ने बताया जब मरीज यहाँ आया, तो हाथ में रक्त संचार पूरी तरह बंद हो चुका था। नसें काम नहीं कर रही थीं। स्थिति बेहद नाजुक थी, लेकिन हमने हार नहीं मानी। हमारी टीम ने 20 दिनों के भीतर चार बेहद जटिल ऑपरेशन किए।
दर्द के साए में उम्मीद की नई किरण
बेटी को खोने का गम अजय और उनके परिवार को ताउम्र सालता रहेगा, लेकिन अस्पताल से डिस्चार्ज होते वक्त अजय के चेहरे पर अपने परिवार का सहारा बनने की संतुष्टि साफ़ झलक रही थी। सिगमा अस्पताल के डॉक्टरों के इस प्रयास ने साबित कर दिया कि जहाँ चिकित्सा में संवेदनशीलता जुड़ जाती है, वहाँ चमत्कार होने में देर नहीं लगती।डॉ. सिद्धार्थ पटेल, संचालक सिगमा अस्पताल ने कहा कि मरीज और उसके परिवार के चेहरे की यह राहत ही हमारा सबसे बड़ा पुरस्कार है।
