लखनऊ।मोहनलालगंज तहसील क्षेत्र के दहियर गांव में तैनात रहे लेखपाल राजेन्द्र बहादुर पर पूर्व में विभागीय कार्रवाई की गई थी। उन्हें उनके कार्यभार से मुक्त करते हुए क्षेत्र से हटाए जाने के निर्देश भी दिए गए थे। इसके बावजूद क्षेत्रीय जनता में इस बात की चर्चा बनी हुई है कि लेखपाल का दबदबा अब भी कायम है, और वे परोक्ष रूप से अपने प्रभाव का उपयोग करते रहे हैं।प्राप्त जानकारी के अनुसार मोहनलालगंज तहसील के दहियर गांव में सरकारी भूमि से जुड़े मामलों सहित अन्य प्रशासनिक कार्यों में राजेन्द्र बहादुर की भूमिका को लेकर पूर्व में शिकायतें प्राप्त हुई थीं। उक्त शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए उच्च प्रशासन स्तर से जांच कराई गई थी, जिसमें प्रथम दृष्टया दोषी पाए जाने पर उन्हें कार्यमुक्त कर कार्यालय से संबद्ध कर दिया गया था। इसके साथ ही उनके विरुद्ध विभागीय कार्यवाही भी प्रारंभ कर दी गई थी।हालांकि, तहसील समाधान दिवस के दौरान कुछ शिकायतकर्ताओं ने फिर से लेखपाल की कार्यप्रणाली और उनके अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप की शिकायतें कीं। खासतौर पर खतौनी नामांतरण जैसे मामलों में रिपोर्ट लगाने में अनावश्यक विलंब की बात सामने आई। जिलाधिकारी ने मामले को गंभीरता से लेते हुए निर्देश दिए कि संबंधित प्रकरणों का तत्काल मौके पर निस्तारण किया जाए और दोषी पाए गए लेखपाल पर नियमानुसार कड़ी कार्रवाई हो।वहीं, इस पूरे प्रकरण के बीच यह सवाल खड़ा हो गया है कि जब लेखपाल को क्षेत्र से हटाया जा चुका है तो फिर भी उनका प्रभाव क्यों बना हुआ है? प्रशासन की सख्ती के बावजूद अगर जमीनी स्तर पर बदलाव नहीं दिखाई देता, तो यह कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।स्थानीय ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि ऐसे अधिकारियों और कर्मचारियों पर कड़ी निगरानी रखते हुए यह सुनिश्चित किया जाए कि उनके विरुद्ध की गई कार्रवाई केवल कागजों तक ही सीमित न रह जाए, बल्कि व्यवहारिक रूप से भी उसका असर दिखे।इस पूरे मामले पर अब निगाहें जिलाधिकारी के आगामी निर्णय पर टिकी हैं, जिससे यह तय होगा कि जिले में प्रशासनिक सख्ती का प्रभाव वास्तव में कितना प्रभावशाली है।
