ग्रामीण बोले पट्टी मलहम तक नहीं, निजी अस्पतालों का सहारा लेने को मजबूर……
फार्मासिस्ट अरुण रोजाना 40 से अधिक मरीजों को दवाएं देकर निभा रहे जिम्मेदारी…..
ग्राम प्रधान और ग्रामीणों ने जताई नाराज़गी, डिप्टी सीएम से शिकायत की तैयारी……
निगोहां।लखनऊ, स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ बनाने के तमाम सरकारी दावों के बावजूद जमीनी हकीकत चौंकाने वाली है। राजधानी लखनऊ से सटे दखिना गांव का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र इसका सबसे बड़ा उदाहरण बन चुका है। करोड़ों रुपये खर्च कर बनी भारी-भरकम इमारत आज उपेक्षा का शिकार है। यहां डॉक्टरों और स्टाफ की कमी के चलते इलाज का नाम तक नहीं है।ग्रामीणों का कहना है कि इस अस्पताल में न तो पट्टी होती है और न ही मलहम की व्यवस्था है। नतीजतन, ग्रामीणों को मजबूरन निजी अस्पतालों का सहारा लेना पड़ रहा है।65 वर्षीय रमेश चंद्र द्विवेदी बताते हैं कि पीएचसी पर डॉक्टर कभी नहीं आते। केवल फार्मासिस्ट ही दवा देकर मरीजों को वापस भेज देते हैं। वहीं संदीप कुमार ने कहा कि सड़क पर गड्ढों के कारण अक्सर लोग चोटिल हो जाते हैं और प्राथमिक उपचार के लिए दखिना पीएचसी पहुंचते हैं, लेकिन स्टाफ की कमी के चलते उन्हें निराशा हाथ लगती है।हालांकि, ग्रामीणों ने फार्मासिस्ट अरुण की सराहना भी की। अकेले ही पूरे अस्पताल का जिम्मा संभालते हुए वे रोजाना 40 से अधिक मरीजों को दवाएं देते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि अरुण की मेहनत और लगन के चलते ही किसी तरह यह अस्पताल चल रहा है, वरना स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह ठप हो चुकी होतीं।ग्राम प्रधान राजकुमारी ने कहा कि पीएचसी पर डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ की तैनाती नहीं है। केवल एक फार्मासिस्ट के भरोसे पूरा अस्पताल चल रहा है, जो विभागीय लापरवाही का बड़ा उदाहरण है। दखिना के उमा शंकर त्रिवेदी ने बताया कि वे इस मामले की शिकायत सीधे डिप्टी सीएम से करेंगे।मोहनलालगंज सीएचसी के अधीक्षक डॉक्टर दिवाकर ने बताया कि दखिना पीएचसी पर डॉक्टर आशीष की तैनाती है, लेकिन मोहनलालगंज सीएचसी में डॉक्टरों की भारी कमी के चलते उनकी ड्यूटी वहीं लगाई जाती है। इस वजह से वे दखिना पीएचसी पर नियमित नहीं पहुंच पाते।ग्रामीणों का कहना है कि सरकार को तत्काल यहां डॉक्टर और स्टाफ की तैनाती करनी चाहिए। लोगों ने चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र कार्रवाई नहीं हुई तो वे आंदोलन करने पर मजबूर होंगे।
